
यमुना नदी की वो तस्वीरें जो सरकार के दावों को चुनौती देती हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद “डबल इंजन” की ताकत दिखाने के लिए यमुना सफाई अभियान ज़ोर-शोर से शुरू हुआ। मशीनें उतरीं, अफसर कैमरों के सामने दिखे, दिल्ली वासियों को कहा गया कि यमुना सफाई का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। कुछ नेताओं द्वारा ऐसे बयान दिए गए कि अब यमुना के साथ-साथ दिल्ली की भी तस्वीर और तकदीर दोनों बदल जाएगी। लेकिन कुछ ही हफ्तों में अभियान की रफ्तार धीमी पड़ गई। आज ज़मीनी हालात फिर वही सवाल खड़े कर रही हैं—क्या यह सफाई थी या सिर्फ़ दिखावा?

दावे बनाम धरातल। यमुना को प्रदूषण मुक्त किया जाएगा।
हकीकत यह है कि कई नालों से अब भी बिना ट्रीटमेंट के सीवरों का पानी सीधे नदी में गिर रहा है।
झाग और बदबू कम होने के बजाय कई इलाकों में और बढ़ी है।
सफाई अभियान की निरंतरता पर गंभीर सवाल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है —“चुनाव के बाद महज कुछ ही दिन हलचल रही, फिर सब सामान्य हो गया।”
राजनीतिक जिम्मेदारी
दिल्ली में सत्ता और प्रशासनिक अधिकारों की जटिल संरचना के बीच केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन जब “डबल इंजन” का दावा किया जाता है, तो जनता परिणाम भी “डबल” चाहती है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बार-बार कहा कि राजनीतिक टकराव खत्म होने के बाद विकास कार्यों में तेजी आएगी। तो क्या यमुना की सफाई उस दावे की पहली परीक्षा थी? और क्या वह परीक्षा पास हुई? सबसे बड़ा सवाल? क्या मौजूदा सरकार के पास इसका जवाब है?

करोड़ों का बजट, मगर नतीजा कहाँ?
यमुना सफाई पर वर्षों से हजारों करोड़ रुपये खर्च होने का दावा किया जाता है। लेकिन सवाल उठता है:
क्या सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (STP) पूरी क्षमता से चल रहे हैं?
क्या औद्योगिक अपशिष्ट पर सख्त कार्रवाई हुई?
क्या प्रदूषण फैलाने वालों पर जुर्माने और मुकदमे दर्ज हुए?
क्या समयबद्ध रोडमैप सार्वजनिक किया गया?
अगर जवाब अस्पष्ट है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
जनता का सवाल
यमुना सिर्फ़ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि आस्था, स्वास्थ्य और दिल्ली की पहचान का सवाल है। हर चुनाव में यह मुद्दा उठता है, लेकिन परिणाम अधूरे रह जाते हैं। अब सवाल यह नहीं कि “किसने क्या कहा? ”सवाल यह है —कब बदलेगी यमुना की सूरत?


















